जब दीवारों पर बसपा का हाथी ही हाथी नजर आता था…


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जालंधर/सोमनाथ कैंथ 
हाथी…हाथी…हाथी… जी हां, एक दौर था जब जिधर देखों दीवारों पर बसपा का हाथी ही हाथी नजर आते थे। 14 अप्रैल 1984 को बाबू कांशी राम ने बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी और शुरू हुआ दीवारों पर नीले रंग से हाथी बनाना। रात होती तो बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ता नहीं दीवाने कहिए जो साइकिल पर नीले रंग डिब्बा और ब्रश लेकर निकल पड़ते और सुबह जब उजाला होता तो दीवारे नीले रंग से हाथी से रंगी मिलती। बीच-बीच में लोग रात को जाग कर भी देखते कि बसपा के दीवाने उनकी दीवारों पर हाथी तो नहीं बना गए।

जहां तक पंजाब की बात है तो कई बार तो विधानसभा चुनावों में यह लगता कि इस बार पंजाब में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बन जाएगी। हालांकि सरकार तो पंजाब में बसपा की नहीं बनी लेकिन एक मौका जरूर मिला जब पंजाब विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी विरोधी पक्ष के रूप में बैठी। यही नहीं पंजाब के लोगों ने बसपा को काफी पसंद भी किया और पंजाब से ही लोकसभा में भी संसद चुनकर जाते रहे। उदाहरण के लिए मोहन सिंह फलियां वाला, सतनाम सिंह कैंथ और हरभजन लाखा इत्यादि।

हाथी पर सवार होकर संसद पहुंचा अकाली दल
1996 लोकसभा चुनाव हुए तो बहुजन समाज पार्टी और शिरोमणि अकाली दल की बीच गठबंधन हुआ। दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और बाबू कांशी राम होशियारपुर की लोकसभा सीट से बड़े मतांतर के साथ विजयी होकर संसद पहुंचे। उनके साथ ही फिरोजपुर से मोहन सिंह फलियांवाला और फिल्लौर से हरभजन लाखा चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। इस दौर में बहुजन समाज पार्टी का झंडा बुलंदियों पर था।
लेकिन बसपा और अकाली दल के बीच यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल पाया। अकाली दल का भाजपा के साथ गठबंधन हो गया और बसपा के 1997 में कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात चली लेकिन गठबंधन सिरे नहीं चढ़ पाया।

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जब बाबू कांशी राम ने पंजाब में डेरा जमा लिया था
पंजाब विधानसभा 2002 के लिए हुए चुनावों के दौरान पंजाब में बसपा ने यह चुनाव बाबू कांशी राम के नेतृत्व में लड़ा। तब दूसरी पार्टियों के आला नेता चाहते थे कि कहीं बाबू कांशी राम उनके हलके में बसपा की रैली न कर लें और बसपा की रैली न हो बाबू कांशी राम तक पहुंच भी करते थे। बाबू कांशी राम का एक ही कहना होता था कि आप इतना डर है तो आप बसपा में क्यों नहीं आ जाते। बड़े-बड़े नेताओं को घुटनों पर ला दिया था बाबू कांशी राम ने।

बाबू कांशी राम का पंजाब में यह चुनाव अंतिम था। तब ऐसा दौर था कि ऐसा लगने लगा था कि पंजाब में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बन जाएगी मगर कांग्रेस पार्टी में सत्ता में आ गई और बाबू कांशी राम पंजाब से चले गए।

लेकिन इन चुनावों में बाबू कांशी राम की दी गई हिदायत को बसपा लीडरशिप लागू नहीं कर पायी। बाबू कांशी राम का कहना था कि बसपा को कामयाब होना है तो उसे ग्रास रूट से बसपा को मजबूत करना पड़ेगा।

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