
जालंधर/सोमनाथ कैंथ
भारत को आजाद हुए 78 वर्ष हो गए हैं। देश उन्नति का शिखर चूम रहा है मगर आज भी हमारे समाज में तथा रूढ़िवादी सोच को नहीं छोड़ने वाले राज्यों मेंं जातिवाद को लेकर कुछ ऐसी घटनाएं घट जाति हैं कि दलित समुदाय सोचने पर मजबूर हो जाता है कि हमने आजादी के बाद क्या पाया कि जातिवाद के नाम पर दलितों को आज भी प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। इस संबंध में बात करने पर एडवोकेट सत पॉल विरदी ने बताया कि 1947 में जब भारत को आज़ादी मिली तो हमारे संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र की नींव समानता और गरिमा पर रखी। उन्होंने दलितों और हाशिए पर खड़े समुदायों की रक्षा के लिए ठोस प्रावधान किए जोकि इस प्रकार हैंः
- • अनुच्छेद 14: सबको कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण।
- • अनुच्छेद 15(1): धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक।
- • अनुच्छेद 15(4) और 15(5): अनुसूचित जातियों व पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान (आरक्षण)।
- • अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन और उसका कोई भी अभ्यास दंडनीय अपराध।
- • अनुच्छेद 46: राज्य का दायित्व कि वह अनुसूचित जाति व जनजाति के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा दे।
हालांकि ये प्रावधान बहुत मज़बूत वादे हैं लेकिन वास्तविकता में, दलितों को राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था में ऐसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है जो उनके नेतृत्व को उभरने से रोकती हैं।
दलित नेतृत्व की बाधाएँ
भारत की जनसंख्या में दलित बड़ी संख्या में हैं—और पंजाब में तो सबसे अधिक (लगभग 32%)। फिर भी राजनीतिक शक्ति उनके हाथों में नहीं आ सकी। इसके कारण सामान्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से गहरे हैं।
(a) प्रतिस्पर्धा बनाम जातिवादः राजनीति में प्रतिस्पर्धा सामान्य है लेकिन दलित नेताओं के सामने तिहरी दीवार है:
- जातिगत पूर्वाग्रह – उच्च जातियां उन्हें बराबरी से स्वीकार नहीं करतीं।
- गरीबी – संसाधनों और पूंजी की कमी।
- साजिश – बदनाम करना और बांटना।
(b) सुनियोजित दमन
- अपमान व बदनामी – दलित नेताओं को मज़ाक या तिरस्कार का पात्र बनाया जाता है (जैसे चन्नी का अनुभव)।
- संसाधन अंतराल – राजनीति के लिए धन, मीडिया और नेटवर्क की कमी।
- फूट डालो – रविदासिया, वाल्मीकि, मज़हबी, आदि धर्मी आदि में बांटकर एकता रोकी जाती है।
- साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति:
- साम – प्रतीकात्मक पद दिए जाते हैं, असली शक्ति नहीं।
- दाम – नेताओं को लालच देकर आंदोलन कमजोर करना।
- दंड – झूठे केस और बदनामी।
- भेद – जातिगत फूट डालकर नेतृत्व को बिखेरना।
(c) प्रतीकवाद बनाम वास्तविक शक्ति
राजनीतिक दल अक्सर चुनाव के लिए दलित चेहरा सामने रखते हैं लेकिन उन्हें असली सत्ता नहीं देते।
दलित नेताओं के न उठ पाने के कारण
- पार्टी, मीडिया और नौकरशाही पर ऊंची जातियों का प्रभुत्व।
- •धर्म और उप जातियों में दलित समाज का बंटवारा।
- सामाजिक प्रतिक्रिया – आज भी दलित नेताओं को जातिसूचक अपमान झेलना पड़ता है।
- कम अवधि का कार्यकाल – दलित नेता बनते ही अंदर-बाहर से कमजोर किए जाते हैं।
उदाहरण:
- डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माण के बाद कांग्रेस ने हाशिए पर डाल दिया।
- बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया गया।
- बाबू कांशीराम और मायावती को लगातार बदनाम किया गया।
- चंद्रशेखर आज़ाद को जेल यातनाएं और गोली तक सहनी पड़ी।
- चरणजीत सिंह चन्नी को उनकी ही पार्टी और जनता के पूर्वाग्रह ने गिरा दिया।
जातिगत उत्पीड़न के हालिया उदाहरण
- हाथरस कांड (2020): दलित पीड़िता के शव का जबरन अंतिम संस्कार।
- रोहित वेमुला (2016): संस्थागत भेदभाव से आत्महत्या।
- ऊना कांड (2016, गुजरात): मरे पशु की खाल उतारने पर दलितों की सार्वजनिक पिटाई।
- मंदिर प्रवेश हिंसा (2023–25): अब भी कई जगह दलितों को प्रवेश से रोका जाता है।
ये घटनाएँ बताती हैं कि अनुच्छेद 17 का सपना अब तक अधूरा है। दलित नेताओं का नैतिक और कानूनी दायित्व
दलित नेता सिर्फ राजनेता नहीं, बल्कि संविधान के torchbearer (ध्वजवाहक) हैं।
उनके कर्तव्य:
- एकता – उप जातीय झगड़ों से ऊपर उठना।
- प्रतिनिधित्व – असली सत्ता की मांग करना।
- जागरूकता – समाज को संवैधानिक अधिकारों की जानकारी देना।
- जवाबदेही – भ्रष्टाचार से दूर रहना।
- मानवता सर्वोपरि – यह बताना कि जाति संविधान की भाईचारे की भावना के खिलाफ है।
वर्तमान दलित नेता – पंजाब और भारत
दल नेता का नाम समुदाय पद
कांग्रेस चरणजीत सिंह चन्नी रविदासिया सिख पूर्व मुख्यमंत्री पंजाब
कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे होलेया (अनुसूचित जाति) अध्यक्ष
कांग्रेस राज कुमार वेरका वाल्मीकि/मज़हबी पूर्व विधायक पंजाब
आप हरपाल सिंह चीमा दलित सिख वित्त मंत्री पंजाब
आप लालचंद कटारूचक दलित सिख खाद्य मंत्री पंजाब
आप डॉ. बलबीर सिंह दलित सिख स्वास्थ्य मंत्री पंजाब
आप जीवन ज्योत कौर दलित सिख विधायक अमृतसर ईस्ट
भाजपा सोमप्रकाश दलित सिख (दोआबा) केंद्रीय राज्यमंत्री वाणिज्य
भाजपा रामदास अठावले महार दलित केंद्रीय राज्यमंत्री, सामाजिक न्याय
भाजपा हंसराज हंस वाल्मीकि/रविदासिया राज्यसभा सांसद
बसपा मायावती जाटव/चमार राष्ट्रीय अध्यक्ष, पूर्व सीएम यूपी
बसपा अवतार सिंह करमपुरी रविदासिया सिख पंजाब अध्यक्ष
शिअद गुलज़ार सिंह रानीके मज़हबी सिख वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री
लोजपा चिराग पासवान पासवान (दुसाध) राष्ट्रीय अध्यक्ष
स्वतंत्र चंद्रशेखर आज़ाद दलित रविदासिया भीम आर्मी/आजाद पार्टी
कांग्रेस जिग्नेश मेवाणी वणकर दलित विधायक, वडगाम गुजरात
सामाजिक परिवर्तन का आह्वान
जातिवाद केवल दलितों की समस्या नहीं है—यह राष्ट्रीय बीमारी है। यह लोकतंत्र को कमजोर करता है और संविधान का मज़ाक उड़ाता है। समाधान के लिए हमें:
- समाज को सिखाना होगा कि जाति ईश्वर की नहीं, इंसान की बनाई हुई है।
- राजनीतिक दलों से जवाबदेही लेनी होगी जो दलितों का वोट तो लेते हैं पर सत्ता नहीं देते।
- दलित-बहुजन एकता को मजबूत करना होगा।
- युवाओं को अंबेडकर का नारा याद दिलाना होगा: “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो।”
आज़ादी के 78 साल बाद भी जाति दलित नेतृत्व को रोक रही है। भारत ने अंबेडकर, जगजीवन राम, कांशीराम, मायावती, खड़गे, चन्नी जैसे महान नेता दिए, लेकिन सभी को कभी न कभी अपमानित, हाशिए पर या बदनाम किया गया। सच्चाई साफ है: दलित नेतृत्व की कमी नहीं है, बल्कि जातिवाद उन्हें उभरने नहीं देता।
डॉ. अंबेडकर ने कहा था:
“जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।”
अब समय आ गया है कि इस अन्यायपूर्ण विभाजन को समाप्त किया जाए और भारत को समानता, गरिमा और भाईचारे पर खड़ा किया जाए।