युद्ध नशों विरुद्ध, सरकार की नीतियाां ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर : परमजीत कैंथ


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चंडीगढ़ : भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा, पंजाब के उपाध्यक्ष परमजीत सिंह कैंथ ने कहा कि भगवंत सिंह मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार का “युद्ध नशों विरुद्ध” असफल साबित हुआ है और सरकार की नीतियाां ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले लगभग चार वर्षों में नशे के कारण करीब 280 लोगों की जान जा चुकी है। ओवरडोज़ और नकली दवाओं से लगातार बढ़ रही मौतें इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि सरकार न तो नशे की सप्लाई पर प्रभावी नियंत्रण कर पाई है और न ही लोगों की जान बचाने के लिए कोई ठोस व्यवस्था खड़ी कर सकी है।

इस विफलता का सबसे गंभीर असर अनुसूचित जाति समुदाय और पंजाब के युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है।उन्होंने उन्होंने आगे कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई में डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण है, और परमजीत कैंथ ने मान सरकार से विस्तृत और अद्यतन जानकारी जारी करने का आग्रह किया।

परमजीत कैंथ ने कहा कि नशे की समस्या का सबसे गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव पंजाब के युवाओं तथा गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ रहा है। बेरोज़गारी, आर्थिक तंगी तथा शिक्षा और रोज़गार के अवसरों की कमी ने युवाओं को नशे की ओर धकेल दिया है। पर्याप्त, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण इलाज व पुनर्वास सुविधाओं के अभाव में यही वर्ग सबसे अधिक पीड़ित हो रहा है, जिससे न केवल उनका वर्तमान बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी अंधकारमय हो रहा है। नशे का बढ़ता प्रकोप ग़रीबी के दुष्चक्र को और गहरा कर रहा है तथा सामाजिक असमानता को बढ़ावा दे रहा है।

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भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि नीति निर्माण और ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बीच व्यापक अंतर है। सरकार के बड़े-बड़े दावों और अनेक अभियानों के बावजूद ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर नशे की सप्लाई चेन को तोड़ने में वह लगातार विफल रही है। कार्रवाई मुख्यतः छोटे तस्करों तक सीमित रही, जबकि बड़े नशा तस्कर और संगठित नेटवर्क अधिकांशतः बच निकलते रहे। पुलिस और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही की कमी, साथ ही राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के आरोपों ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों की विश्वसनीयता को कमजोर किया, जिसका सीधा लाभ नशा माफिया को मिला।

परमजीत कैंथ ने कहा कि इलाज और पुनर्वास के मोर्चे पर भी सरकार पूरी तरह विफल रही है। नशे के आदी लोगों को मरीज की बजाय अपराधी के रूप में देखा गया। सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या सीमित है, उनकी गुणवत्ता असंगत है और फॉलो-अप व्यवस्था बेहद कमजोर है, जिसके परिणामस्वरूप नशे की लत में दोबारा फँसने की दर लगातार ऊँची बनी हुई है। नशे की खपत, सप्लाई रूट्स और इलाज के परिणामों से जुड़ा पारदर्शी और अद्यतन डेटा अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे डेटा-आधारित नीति निर्माण संभव नहीं हो पा रहा है, जबकि अनुसूचित जाति समुदाय और पंजाब के युवाओं के भविष्य पर संकट लगातार मंडरा रहा है।

कैंथ ने ज़ोर देकर कहा “युद्ध नशों विरुद्ध” केवल नारों और प्रचार तक सीमित रहा है। जब तक नशा सप्लाई नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाता, इलाज और पुनर्वास प्रणालियों को मज़बूत नहीं किया जाता, प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती और युवाओं के लिए रोज़गार-आधारित सामाजिक सुधारों को एक साथ लागू नहीं किया जाता, तब तक नशे के खिलाफ कोई भी अभियान प्रभावी नहीं हो सकता। उन्होंने पंजाब सरकार से अपील की कि वह नारेबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस, पारदर्शी और वास्तविक रूप से ज़मीनी स्तर पर प्रभावी कदम उठाए।

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