
2026 के लिए असम, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में हुए विधनासभा चुनावों के नतीजों से बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। इन चुनाव नतीजों से जहां भाजपा गदगद है वहीं इन चुनावी संकेतों के बाद पंजाब कांग्रेस में एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। कांग्रेस के लिए पंजाब में राजनीतिक जमीन पूरी तरह खोई नहीं है, लेकिन उसे फिर से हासिल करना आसान भी नहीं लग रहा। यही वजह है कि पंजाब व पार्टी के सामने अवसर और चुनौती दोनों एक साथ मौजूद हैं।
पंजाब के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो वर्तमान में पंजाब में 94 सीटें आम आदमी पार्टी और 16 सीटें कांग्रेस के पास हैं।
सबसे बड़ा अवसर यह है कि राज्य में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती ताकत कांग्रेस के लिए एक अप्रत्यक्ष अवसर बन सकती है। पंजाब जैसे राज्य में, जहां क्षेत्रीय और पहचान आधारित राजनीति का असर गहरा है, कांग्रेस खुद को “संतुलित और स्थानीय हितों की आवाज़” के रूप में पेश कर सकती है—एक ऐसा विकल्प जो न पूरी तरह केंद्र की राजनीति से जुड़ा हो, और न ही केवल वादों तक सीमित हो।
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक गुटबाजी है। टकसाली कांग्रेस नेताओं को खुडेलाइन किया हुआ है और नेतृत्व को लेकर असमंजस है। स्थानीय स्तर पर संगठन की कमजोरी—ये सभी ऐसे कारक हैं जो उसके संभावित लाभ को कम कर सकते हैं। टकसाली नेताओं में कई ऐसे कांग्रेसी नेता है जो करीब 40-40 साल से कांग्रेस को मजबूत करने में लगे हुए हैं मगर जब कांग्रेस की सरकार बनती है तो उन्हें चेयरमैनी जैसा कोई पद देना तो दूर की बात, उनको कई-कई साल तक पूछा नहीं जाता और जब चुनाव आते हैं तो उन्हीं टकसाली नेताओं को आगे करके कांग्रेसी प्रतिनिधि वोट मांगते हैं। अगर पार्टी इन मुद्दों को समय रहते नहीं सुलझाती तो राजनीतिक अवसर हाथ से निकल सकता है।
अंततः, कांग्रेस के सामने असली परीक्षा यह है कि क्या वह सिर्फ सरकार की आलोचना करने तक सीमित रहती है या फिर एक संगठित रणनीति के साथ आगे बढ़ते हुए 2027 के चुनाव में वापसी की कहानी लिखती है।