
भारतीय संविधान में वोट का अधिकार तो मिला लेकिन देश की सत्ता पर काबिज होने के सपने संजोकर जी रहा दलित वोटर दशकों से भटक रहा है। अच्छे दिनों का आस में कभी किसी पार्टी को सत्ता सिंहासन तक पहुंचाया तो कभी किसी पार्टी को लेकिन आज स्थिति यह है कि सभी पार्टियों को बारी-बारी सत्ता सिंहासन तक पहुंचाने के बाद खुद टूट कर रह गया है।
हालांकि आजादी के बाद दो लहरें जरूर ऐसी उठीं कि जो दलितों के दिन बदल सकती थी और सत्ता सिंहासन तक उन्हें पहुंचा सकती थी लेकिन न तो सभी दलित वर्ग बाबा साहिब बीआर अंबेडकर ने नेतृत्व में और न ही बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक बाबू कांशी के नेतृत्व में एकजुट हो पाए। अस्सी और नब्बे के दशक में एक बार जरूर लगा था कि दलित एकजुट हो रहे हैं लेकिन कुछ ही सालों में बिखर गए। इसका सबसे बड़ा कारण ग्रास रूट पर न पकड़ न मजबूती।
आंखों में सपने लेकर चल बसे दुनिया से
लाखों दलित जो कभी सत्ता के लिए एक झंडे तले इकट्ठे हुए थे लेकिन जोड़-तोड़ की राजनीति ने उन्हें इतना तोड़ा कि वे आंखों में सत्ता के सपने लेकर ही दुनिया से चल बसे। जो बचे हैं वे इतने टूट गए हैं कि वे कभी इधर भटक रहे हैं तो कभी उधर। आज वे किसी ऐसे कांशी राम की तलाश में हैं जो उनमें नये प्राण फूंक सके।
वर्तमान हालात की बात करें तो आज की युवा पीढ़ी से सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है पूछा जाए तो हाजिर जवाब हैं लेकिन न तो उन्हें अपने हकों की बात पता है और न ही दलित इतिहास का कुछ पता है। हां सिम कार्ड रिचार्ज करवाना नहीं भूलते। चाहिए तो यह था कि दलित इतिहास के बारे में रिचार्ज होता लेकिन ग्रास रूट पर मेहनत नहीं होने से सब आंदोलन बेकार हो गए।
लेकिन टीस अभी बाकी है
समय-समय की सरकारों और भारतीय संविधान की सख्ती के चलते हालांकि छुआछूत(अनटचेबिलिटी) की बात तो नहीं होती लेकिन आरक्षण के कारण उच्च वर्गों में टीस अभी भी जारी है। हक तो दूर की बात एससी बच्चों को स्कूल में किताब मिल जाए तो दशकों तक बात नहीं भुलाई जाती। भले ही आज एससी स्टूडेंट्स अपनी मेहनत से सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं, कंपीटिशनों में भाग ले रहे हैं और मेरिट के आधार पर सफलताएं हासिल कर रहे हैं लेकिन आरक्षण का टैग लगा होने के कारण उस सफलता जो एक दलित बच्चे ने कंपीटिशन में मेरिट के आधार पर हासिल की है उसे सफलता नहीं आरक्षण माना जा रहा है।